रवि मांगता नूर हे तुमसे,
श्रष्टि मांगती नव कायाकल्प ।
गिरिवर का ह्रदय पसीज उठेगा ,
ह्रदय में जब द्रंड निश्चय हो खुल जाये समस्त विजय विकल्प ।।
उडा परिंदा जो नभ में था ,
उजड़े पंखो से लड़ता सा।
विश्वास मान लो गिरा भी था जमी पर ,
वो कुछ सिसका सा वो सहमा सा ।।
पर बाजुओ को वो चलता रहा,
निज बल का मान बढाता रहा ।
निजबल से ही वो हे कर रहा,
असीम आकाश में एकछत्र राज ।।
नूर भरे अपने नैनों में ,
सुखद स्वप्न उमड़ने दो ।
गहन परिश्रम कर उन स्वप्नों को ,
वर्तमान से लड़ने दो ।।
हुए परिंदे आज पुराने,
उन से भी ऊचा हे हम उड़ सकते ।।
कर दे दुनिया को स्तब्ध ,
करे अनेक कीर्तिमान उपलब्ध ,
हम भी इतना सामर्थ्य हे रखते, हम भी इतना सामर्थ्य हे रखते ।।
- समीर